राब्ता

हवा के झोंकों की तरह
किन शहरों से निकले
किन गलियों में टकराए
किस देश में खो गए?
अजनबी से लो फिर आज
हम अजनबी ही हो गए ।

जिंदा हूँ हैरान हूँ
इन आती जाती साँसों पर
मुझे लगा जान मेरी
तुम जाते जाते ले गए
न जाने जिंदा लाश हूँ या
कोई भरम तुम दे गए ?

बड़े घाटे का सौदा किया
इस इश्क के बाज़ार में
तुम बेगाने कभी लगे नहीं
पर हम खुद से गैर हो गए
अब चैन न करार है सवाल ही सवाल हैं
जाते जातेे उलझनें तुम ये कैसी दे गए?

खुद को तलाशने का भरम
ले आया खुदा की चौखट पर
सजदे में सर को झुकाया तो जाना
मेरे खुदा भी तुम थे हो गए
न तुम नज़र के सामने न वो नज़र आता कहीं
इस बेजान से शरीर की दोनों ही रूह हो गए ।

अब मौत से गिला नहीं
रूह से है वास्ता
अब एक हो या अलग
ये तेरा मेरा रास्ता
इस जहाँ में नहीं न सही
उस जहाँ में वाबस्ता हम हो गए ।

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Hava ke jhonkon kee tarah

Kin shaharon se nikale

Kin galiyon mein takarae

Kis desh mein kho gae?

Ajanabee se lo phir aaj hum

Ajanabee hee ho gae

 
Jinda hoon hairaan hoon

In aatee jaatee saanson par

Mujhe laga jaan meree

Tum jaate jaate le gae

Na jaane jinda laash hoon

Ya koee bharam tum de gae ?

 
Bade ghaate ka sauda kiya

Iss ishk ke baazaar mein

Tum begaane kabhee lage nahin

Par ham khud se gair ho gae

Ab chain na karaar hai

Savaal hee savaal hain

Jaate jaatee ulajhanen tum ye kaisee de gae?

 
Khud ko talaashane ka bharam

Le aaya Khuda kee chaukhat par

Sajade mein sar ko jhukaaya to jaana

Mere khuda bhee tum the ho gae

Na tum nazar ke saamane na vo nazar aata kaheen

Iss bejaan se shareer kee donon hee rooh ho gae .

 
Ab maut se gila nahin

Rooh se hai vaasta

Ab ek ho ya alag

Tera mera raasta

Iss jahaan mein nahin na sahee

Us jahaan mein vaabasta ham ho gae


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शब्द/ Words


शब्दों की धारा जब बहती है
तब कोई कविता कहती है…

मन के गलियारों से निकल
भावों में जब वह ढलती है
आँखों से मोती बन बहती है
तब कोई कविता कहती है
शब्दों की धारा जब बहती है…

हर कोने से निकल फिसल
तेज नदी सी स्वच्छंद मग्न
सब बाँध तोड़ के रहती है
तब कोई कविता कहती है
शब्दों की धारा जब बहती है…

ये शब्द नहीं हैं केवल शब्द
ये सदियों की दबी आवाजें हैं
जो खोलती हैं जब लब अपने
तब कोई कविता कहती हैं
शब्दों की धारा जब बहती है…

इस धारा को बह जाने दो
जो कहती है कह जाने दो
जब दर्द बहाना चाहती है
तब कोई कविता कहती है
शब्दों की धारा जब बहती है…

दबे छिपे अहसासों को
मन के गहरे सन्नाटों को
जब और सह नहीं सकती है
तब कोई कविता कहती है
शब्दों की धारा जब बहती है…

इस धारा में छुपा कर लम्बी रात
गहरे कड़वे और काले राज
जब सागर से जा मिलती है
तब कोई कविता कहती है
शब्दों की धारा जब बहती है…

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When words flow like a river

Then they create some new poem

 
Coming out from lanes of heart

When they mould into emotions

Rushing through eyes

They create some new poem

When words flow like a river

 
Coming out from all corners

Rushing like a mad river

Breaking away all restrictions

They create some new poem

When words flow like a river

 
These are not mere words

They are years old repressed voices

When they open their sealed lips

They create some new poem

When words flow like a river

 
Let these words flow out

Let them get rid of burden

When they want to flush out pain

They create some new poem

When words flow like a river

 
To express the burried emotions

To break the lonliness

Which they can bear no more

They create some new poem

When words flow like a river

 
In its flow there is long night hidden

Deep, bitter and black secrets

Merge in ocean with all of them

They create some new poem

When words flow like a river

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रहमतें


​बहुत आबाद हैं मेरी तन्हाइयाँ

तेरी रहमतों का असर है

तन्हा हो कर भी मैं तन्हा नहीं

ये भी तेरा ही करम है।

🌿🌿🌿
रोशन है तू अब भी मेरे दिल के शहर में

लगता है हर पल तू संग है मेरी रहगुज़र में

अँधेरों से भी अब गिला नहीं

अब यही सहर हैं,

बहुत आबाद हैं मेरी तन्हाइयाँ

तेरी रहमतों का असर है।

🌿🌿🌿

 
उदास होने नहीं देती मुझे यादें तेरी

आँसू छलकने नहीं देती ये निगाहें मेरी

मेरे लबों पर अब भी मुस्कान है

कैसा ये सितम है?

बहुत आबाद हैं मेरी तन्हाइयाँ

तेरी रहमतों का असर है।

🌿🌿🌿
नज़रों से दूर सही, दिल के बहुत करीब हो तुम

पास न होकर भी हर वक्त नज़दीक हो तुम

तेरे न होने का अहसास ही नहीं

ये कैसा भरम है?

बहुत आबाद हैं मेरी तन्हाइयाँ

तेरी रहमतों का असर है।

🌿🌿🌿
कौन कहता है तन्हाइयाँ जीने नहीं देतीं

दिल के ज़खमों को सीने नहीं देतीं

अगर यादों से सराबोर हों तो

ये ही मरहम हैं

बहुत आबाद हैं मेरी तन्हाइयाँ

तेरी रहमतों का असर है।


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