दर्द-ए-निहाँ

कभी किताब-ए-दिल को पढ़नाये राज़ सारे अयाँ करेगा जो करना चाहा ता'बीर-ए-गुरेज़ाँकैसे कहो खुद को बयां करेगा हर पन्ने पर है मुख्तलिफ़ सी स्याही हर हर्फ़ दर्द-ए-निहाँ कहेगा कभी किताब-ए-दिल को पढ़ना कि राज़दारी से है सजाया हर तोहफा-ए-गम इस ज़िंदगी काजो होना चाहो इल्तिफ़ात-ए-गुरेज़ाँतो ये इख़्तिलाफ-ए-वफ़ा करेगा हर पन्ने पर है मुख्तलिफ़ सी स्याही [...]

मैं अमृता नहीं हो सकती

लेखिका होना आसान है लेकिन लिखना आसान नहीं, हर बार जब कलम उठती है तो शब्द मन से कागज़ पर आते-आते खुद ही बदल जाते हैं । उन्हें भी पता है कि ऐसे के ऐसे उतर गए तो बहुत से प्रश्नचिन्हों से घेर लिए जाएँगे। वो प्रश्नचिन्ह उन्हें डराते हैं । तो कभी साँप बन [...]

शजर का कफन

काश सुन लेते तुम कटते शजर की सिसकियाँ,काश देख सकते उजड़े घरोंदों की वीरानियाँ,काश पहुँच जातीं तुम तक पंछियों की कराहटें,काश महसूस होता दर्द टूटती टहनियों का तुम्हें, काश पढ़ लेती आँखें तुम्हारी पत्ते-पत्ते की गुज़ारिशें, काश ईंट-पत्थर की इमारतें शजरों का न कफन होता, काश बेलगाम लालच तुम्हारा इस कदर न बढ़ा होता, तो [...]

खोज

खोज दर-ब-दर, हर तरफ ढूंढता हूँ, घर में रहकर भी एक घर ढूँढता हूँ ! प्यासा हूँ कुछ इस कदर कि- दरिया किनारे भी आब, शिद्दत से ढूंढता हूँ ! वो कहते हैं पागल दीवाना मुझे, मैं दीवानगी में भी उन्हीं को ढूँढता हूँ ! कैसे करूँ बयाँ अहसासों को शब्दों में, मैं बयां करने [...]

घर की वीरानी

घर की वीरानी घर की वीरानी में भी दीवारें बोल उठती हैं, अक्सर तन्हाई में भी ये महफिलें शोर करती हैं, अकेले में भी तन्हा न रहूँ, ये कोशिशें इन ईंट-पत्थरों की, ज़मीं पर ही जन्नत के नज़ारे खोल देती हैं, देखती हूँ गौर से जब इन दर-और-दीवारों को, वो सीने में दफ़न कई राज़ [...]

जैसे कुछ हुआ ही नहीं

जैसे कुछ हुआ ही नहीं एक उम्र गुज़ारनी है तेरे बगैर और हम जी रहे हैं ऐसे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं शरीर से दिल निकल गया, तेरी साँसों के साथ और हम साँस ले रहे हैं ऐसे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं लुट गई हँसी, लुट गई खुशी, लुट गई जिंदगी और हम मुस्कुरा [...]

और यूँ हम एक रात और जी गए

और यूँ हम एक रात और जी गए । ______________________________ मेरे आँसुओं को मेरे सब दर्द पी गए, और यूँ हम एक रात और जी गए। ज़ख़्म तो बहुत छोड़े वक़्त ने रूह पर मगर, बड़ी सफाई से उसका दिया हर ज़ख़्म सी गए। उम्र लंबी थी गम-ए-रात की हिज्र की तरह, इंतखाब की कोई [...]

यादों में कहीं

यादों में कहीं कोई सुराख न कर दे, इस बात से डर लगता है, छन-छन के बह न जाएँ एक-एक कर, इस बात से डर लगता है! फ़क़त ये चंद मोती हैं, जो सँभाले हैं जीने के लिए, लेकिन यूँ न समझ लेना कि मुझे मौत से डर लगता है! परछाईं की माफिक धीरे-धीरे सिमट [...]

क्या ख़रीदने निकले हो

क्या खरीदने निकले हो खुशियाँ बिकती नहीं और गम का कोई खरीददार नहीं, आस सस्ती नहीं और बेसब्री का कोई हिसाब नहीं, प्यार महंगा है बहुत और नफरतों को पालना आसान नहीं, शांति की कोई दुकान नहीं और अशांति का समाधान नहीं, क्या ख़रीदने निकले हो? बिकने वाली चीज़ खुद मजबूर है और जो बिकती [...]

कतरे से गुहर

कतरे से गुहर बहुत कुछ गुज़री है ए-दिल कतरे से गुहर होने तक, यूँ ही तो नहीं सफर कामिल है, बादल से बिछड़ सीप के सीने तक, गम-ए-जुदाई, खौफ-ए-तन्हाई, खौफज़दा मुसाफ़िर, और चल देना यूँ ही तन्हा, किसी अंजाम का आगाज़ होने तक, आंधियों का सफर और गर्क होने का डर, अंदेशों से लिपट, हर [...]