शाम तुम्हारे साथ गुज़ारुँ

कब चाहा था मैंने कि मैं, शाम तुम्हारे साथ गुज़ारुँ ?
मेरी बस एक चाह थी इतनी, कुछ पल बैठ मैं तुम्हें निहारूँ।

तुम सूरज से तपिश तेज़ हो, मैं एक गुमनाम सितारा हूँ ,
तेज प्रचंड प्रकाश के समक्ष, कौन तारे के वर्चस्व को माने ?

कब चाहा था मैंने कि मैं, तुम्हारे जीवन में छवि अपनी उतारूँ?
मेरी बस एक चाह थी इतनी, कुछ कदम तुम्हारे संग मिला लूँ ।

तुम स्वछंद विचरने वाले, मैं बेड़ियाँ पाँव में डाले,
क्षितिज को छूने वाले पंछी, कब पिंजरे की मैना को निहारें !

कब चाहा था मैंने कि मैं, स्पर्श करूँ या तुम्हें छू पाऊँ ?
मेरी बस एक चाह थी इतनी, मान से मैं सराही जाऊँ ।

तुम सौंदर्य रस पीने वाले, क्यों स्वीकारो निश्छल प्रेम के प्याले ?
कृष्ण नहीं तुम जो आ जाओ, मीरा की धुन जब नाम पुकारे ।

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