बस

जो कल कल बहता दरिया था
उन्मुक्त चहकता मदमस्त भरा
वो आज अचानक सूख गया

वो मन के भीतर इक सूरज था
ओज भरा उकसाता सा
वो सूखे दरिया संग डूब गया

इक इंद्रधनुष रंगीला था
सतरंगी आस जगाता सा
वो डूबे सूरज संग टूट गया

सपनों का सुंदर संसार भी था
आँखों में ख्वाबों का जाल भी था
रंगों में उलझ कर बिखर गया

यादों का एक बागीचा था
पंछी, तितली और फूल भी थे
वो सपनों के संग धुल ही गए

अब सुकून भरी वीरानी है
कोई चाह नहीं हैरानी है
पलकों पर सपनों का भार नहीं

एेसा नहीं जीवन से प्यार नहीं
हाँ पहले जैसा उत्साह नहीं
हल्के हैं कदम, मन खाली है

बहुत निभा ली यारी तुमसे
अब चलने की तैयारी है
देखें अब कदम किस राह चलें

आगे जाने क्या मंज़र हो
बस इतना मन का निश्चय है
अब शांत स्निगध यह जीवन हो

उस पार जो पलकें खोलूँ तो
इस पार का कुछ भी संग न हो
इक कोरा मन इक नई कलम
बस और न कुछ चाहे अब मन
बस…

Copyright © 2017 All rights Reserved Wings Of Poetry, Meenakshi Sethi 

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