एक पैकेट जिंदगी/ One Packet Life

Hello friends! 

I wrote this poem on request of one elderly lady. Original poem is in hindi along with my attempt to translate it in english. Hope you will enjoy it too. 

‘एक पैकेट ज़िंदगी’

श्वेत निर्मल आत्मा को बाँध माया की डोर से,
एक पैकेट जिंदगी का लेकर चला उस ओर से।
सीधा मैं टपका माँ की ममता भरी उस गोद में,
जीवन जहाँ संपूर्ण था, उन लोरियों की गूंज में।
था पिता का दुलार भी ,भाई बहन का प्यार भी,
गूँजता जहाँ था बचपन,किलकारियों के शोर से।
न लगी कभी कोई कमी, न तमन्नओं का शोर था
दूर तलक खुशियाँ ही थीं, मुस्कुराहटों का दौर था
जिंदगी का पैकेट भी तब तक हल्का व बेदाग था
भोले से उस बचपन में कोमल मन पर न कोई भार था।
बेपरवाहियों में झूमता उड़ गया स्वर्णिम काल वह,
और अल्हड़ उमर में जा पहुँचा माँ का लाल मैं।
कुछ सीखने का चाव था और मन में कई ख्वाब थे।
मासूम बचपन ने जहाँ छोड़ा था वहाँ सवाल ही सवाल थेे।
कौतुहल सा था हृदय में आँखों में हैरानियाँ
कुछ सीखने के चाव में की बहुत नादानियाँ
अब भी यह पैकेट जिंदगी का था कुछ मासूम सा
बढ़ रहा था नई नवेली राहों पर मचाता धूम सा।
आखिर वहाँ पहुँचे जहाँ चाहतों का शोर था।
मस्तियाँ, रंगीनियाँ और जोश चारों ओर था।
अनेकों सपने आँखों में और दिल में कई अरमान थे।
बादलों पर पाँव रखकर हम भरते नई उड़ान थे।
क्या सही और क्या गलत? किसको इतना होश था?
नई नई थीं हसरतें और नया नया सा जोश था।
कुछ तो भारी हो गया था पैकेट हमारी जिंदगी का।
पर हमें तो गर्व था अपनी मोहब्बत की बंदगी का।
पंख लगा कर कहाँ उड़ गए जाने सपनों भरे वे पल।
अब थकावट आँखों में है हाथ में सब्ज़ी व फल।
शादी, बच्चे, घर-गृहस्थी, मेरा बस गया संसार था
रात दिन का होश न था, मैं मग्न व खुशहाल था।
धीरे-धीरे चुपके से जाने कब बड़ गई लाचारियाँ
परिवार को पालने को थीं मेरी कई जिम्मेदारियाँ।
पिस रहा था चक्की में अब मैं जुटाने को रोटी और कपड़ा।
प्रेम-प्यार सब हवा हो गया, अब था बस लफड़ा ही लफड़ा।
कुछ दाग आ गए पैकेट पर, अौर कुछ बड़ रहा था बोझ भी।
आखिर समय के साथ कुछ कुटिल हुई थी मेरी सोच भी।
यह समय भी बह गया, चंचल नदी के समान।
सोचा अब बच्चों को दे दूँ, जीवन की यह कमान।
अब कदम थकने लगे, अब सफर कुछ धीमा हुआ।
पतवार दे नई पीड़ी को हमने अपना वचन पूरा किया।
सोचा था अब चैन होगा और कुछ खामोशियाँ,
अब जिएंगे ख्वाब अपने, फिर से करेंगे दिल जवाँ।
तन्हाई मिली तो जाना जीने की इस हौड़ में,
खुद को कहीं भूल आए जिंदगी की दौड़ में।
इतना बदरंग व मैला मेरा वह पैकेट कैसे हो गया,
भेड़चाल में खोकर खुद को मेरा हृदय अब रो दिया।
धीरे-धीरे दस्तक देती चौखट पर आ पहुँची साँझ भी।
आईना भी पहचान न पाया, बोझिल हो गई साँस भी।
एक-एक कर बिछडे़ साथी, जाने कैसे सह गया मन।
अब कहाँ बात वह पहले जैसी, अब विक्षिप्त सा यह तन।
आस में मुक्ती की अब बैठे, चौखट पर टकटकी लगाए।
किंतु इतना मैला पैकेट, नारायण क्यों लेने आएँ?
किंतु इतना मैला पैकेट, नारायण क्यों लेने आएँ?

Tied up with rope of Maya

My pure white soul

Started It’s journey 

From that side of shore

The packet of my life reached

My mother’s warm lap

Where my life was complete 

In her sweet lullabies rap

Affection of my father 

And love of siblings 

My childhood flew away

 Laughing and kidding

That was a golden era 

Of my life’s beautiful season

Free of greed or desires

It was light like feather

It evaporated like scent and

I reached adolescence 

With enormous questions 

And doubts in my heart

I was a keen learner

Right from the start

I did many mistakes

In my learning haste

But still that packet of life

Was innocent and bright!

With enthusiasm and gleam

I reached my teens

That life was full of love

With never ending dreams

Right or wrong

Lost their sense

The packet of my life

Became heavy and dull

The time flew soon

And I reached life’s noon

Under burden of life

I became responsible and wise

My kids and my wife

Were now part of my life

Slowly life became a challenge 

And to meet my needs

I used many tactics

Packet of my life 

Got some more dirt

But I never got time 

To review its worth

Days turned in months

And months in years

I handed my responsibility 

To my daughters and sons

I reached that period

Which was for rest and peace

Then I realised

That in my speed

To discover life

I never enjoyed little moments

And lost that gift

Received from heaven

Packet of my life

Is now tattered with rifts

While I’m so close

And anxiously awaiting

To meet God’s light

After I damaged 

This packet of my life!

But why should he come

To clean this dirt

Which I accumulated

Over all these years!!

Advertisements

40 thoughts on “एक पैकेट जिंदगी/ One Packet Life

  1. There was a Hindi film ‘Ek Muthhi Aasman’, released perhaps before you were born, with the son (forgot his name) of yester years’ villain Jeevan, as the hero.

    I was also reminded of Shahir Ludhianvi’s “Gar isiko jeena kehte hai, youn hi jee lenge, uff na karenge, lab see lenge, aansoo pee lenge.” Some lines of Hindi/Urdu poetry are so deeply routed in Oriental thought that they cannot be translated – that is why I said your Hindi poems are better. The only really great such translation is Edward Fitzgerald’s translation of Omar Khayyam’s ‘Rubaiyat’ with classic lines ;like “…the moving finger writes, and having writ moves on, Not all thy piety nor wit can lure it back to cancel half a line.:nor all thy tears wash out a word of it.” One lifetime is not enough to read all the good works.

    Liked by 2 people

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s