फिर कभी नहीं/ Never Again 

मैं तो बेल थी

लिपटी हुई

उस शाख से

बढ़ती हुई

कुछ और

बढ़ने की चाह में

क्या मिला 

मुझे कुचल तुम्हें?

मैं नदी थी

अल्हड़ सी

भागती

अपनी ही धुन में

नाचती

क्या तेज़ मेरी

चाल थी

क्यों रोका

मेरे प्रवाह को फिर?

मैं कली थी

कुछ नादान सी

सुंदर मेरी

मुस्कान थी

खिलने को

आतुर थी बड़ी

क्यों तोड़ा मुझको

फिर डाल से?

मैं थी वो 

नन्ही पंछी सी

उड़ने को आतुर

पंख थे

ऊँची मेरी

उड़ान थी

क्यों कैद

पिंजरे में किया?

क्यों छीनते हो

हर बार तुम?

मेरी आँखों से…

सपने मेरे

लबों से

मुस्कान ये

पंखों से

उड़ान मेरी

क्यों देता है

सुकून तुम्हें

मेरा रोंदना

मेरा टूटना

मेरा सिसक सिसक 

दम तोड़ना

क्या यही है

अना तेरी

गुरूर तेरा

मेरे बढ़ते कदमों

को रोकना

मुझे जिंदा लाश

बना कर

मुझमें फिर जिंदगी

ढूँढना?

क्या पाओगे तुम?

झूठी अपनी शान में

नहीं कुछ भी नहीं…

देखना एक दिन

तुम खुद ही

तन्हा रह जाओगे।

हर जगह मुझको खोजते

पर पाओगे मुझे

कहीं नहीं।

फिर कभी नहीं…

I was a climber

Climbing that branch

My dream was climbing 

High n high

Why you crushed me

Before that?

I was a free river

Flowing to far lands

Dancing and speeding

Singing my own song

Why you stopped 

My flow then?

I was a little bud

Waiting to bloom

In a beautiful flower

Smiling on that branch

Why you plucked

Me from my bush?

I was a birdie

Flying high was my aim

Sky was my limit

With dreams in my eyes

But you caught me

And put in a cage

Why you do this everytime

Crushing me,

Plucking me

Putting me behind bars

Do you find 

Immense pleasure

In doing this all?

You steal my smile

You make me cry

What blessing do you find

In playing these games?

You will gain nothing

Nothing at all

In end you will find

You are all alone

And loneliness 

Will ask you to search me

But then you will be

Fail to find

I will not be here

I will be nowhere…

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36 thoughts on “फिर कभी नहीं/ Never Again 

  1. Amazing! I love the questions! They leave a mark; and I end up trying to answer them. And the end, “I will be nowhere…”, is the perfect ending! Bravo! This is just beautiful, it’s deep and touching. I felt a blow with each question. Wow! I’m short of words.

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  2. फिर कभी क्यों नहीं
    वो बीज भी फूूटा था
    धरती से कहता था
    अंकुरित होना मेरा प्रारब्ध’ है
    और
    सृष्टि अपने आप में परिपूर्ण
    युगों के बाद संजोए है भीतर।
    गया में, पुष्कर में
    मैं अपना श्राध अपने हाथ से
    कर आया हूं।
    फिर कभी क्यों
    अभी क्यों नहीं
    चॉद पर एक
    प्लाट खरीदें।
    मुझे सिकन्दर का खाली हाथ
    जाना कभी पसन्द न आया।
    दरअसल देश जीते मुल्क जीते
    दिल जीतने
    फिर कभी नहीं लौटा।

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